Pending court cases in India and the demand for encounters
In this Hindi Short, Vinay Pasricha describes a family whose land is grabbed. The lawyer promises a strong case, then the dates keep coming, and by the time the verdict arrives their hair has turned grey. He says this is the reality for crores of Indian families, stating that more than 5 crore cases are pending, roughly one case for every 25 Indians. Civilisation rests on a simple link: a crime happens and a court delivers a verdict. In India, he argues, that link is breaking. Victims pay the price, and lakhs of people sit in jail for years awaiting trial. As trust in courts erodes, people demand instant action, even the bullet, and where people trust the gun more than the court, the rule of law weakens. Citing 22 judges per million people, he calls for modern courts and for judicial reform as a national priority: "India doesn't need mob justice; it needs courts that work."
Key points
- He states that more than 5 crore cases are pending, about one for every 25 Indians.
- Endless delay breaks the basic link between crime and verdict.
- Loss of trust in courts drives public demand for encounters, which weakens the rule of law.
- With 22 judges per million people, he calls for modern courts and judicial reform as a national priority.
भारत को भीड़ का न्याय नहीं चाहिए। भारत को काम करने वाली अदालतें चाहिए।
Hindi summary
इस हिंदी शॉर्ट में विनय पसरीचा एक परिवार की कहानी से शुरू करते हैं जिसकी ज़मीन पर कब्ज़ा हो जाता है। वकील कहता है केस मज़बूत है, फिर तारीख पर तारीख मिलती है, और फ़ैसला आने तक बाल सफ़ेद हो जाते हैं। उनके अनुसार अदालतों में 5 करोड़ से ज़्यादा केस पेंडिंग हैं, यानी हर 25 में से एक भारतीय का केस अटका है। सभ्यता इस सिद्धांत पर टिकी है कि अपराध हो तो अदालत फ़ैसला दे, पर भारत में यह कड़ी टूट रही है। लाखों लोग सालों तक सिर्फ़ ट्रायल का इंतज़ार करते हैं। जब लोग अदालत पर भरोसा खो देते हैं तो वे गोली की माँग करने लगते हैं, और जहाँ बंदूक पर भरोसा अदालत से ज़्यादा हो, वहाँ कानून का राज कमज़ोर होता है। हर 10 लाख लोगों पर सिर्फ़ 22 जज हैं। वे आधुनिक अदालतों और न्यायिक सुधार को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाने की माँग करते हैं।
Topics
Transcript
Full transcript in Hindi · 301 words
सोचिए आज सुबह आप उठते हैं और पता चलता है कि आपकी जमीन पर किसी ने कब्जा कर लिया। आप पुलिस के पास जाते हैं, फिर अदालत के पास वकील कहता है, केस मजबूत है, जीत पक्की है। लेकिन वह आपको एक तारीख देता है, फिर दूसरी तारीख, फिर तीसरी। और जब आखिरकार फैसला आता है, आपके बाल सफेद हो चुके होते हैं। यह कोई फिल्मी कहानी नहीं है। यह भारत के करोड़ों परिवारों की हकीकत है।
आज भारत की अदालतों में 5 करोड़ से ज्यादा केस पेंडिंग है। मतलब हर 25 भारतीयों में से एक का केस अदालत में अटका हुआ है। हजारों सालों से सभ्यता एक सीधे से सिद्धांत पर टिकी है। अपराध होता है। अदालत फैसला देती है। लेकिन भारत में यह कड़ी टूट रही है। सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार में ही अंतहीन देरी है। जरा सोचिए इस देरी की कीमत कौन चुकाता है?
पीड़ित और उनके परिवार। जेलों में बंद लाखों लोग सालों साल सिर्फ ट्रायल का इंतजार करते रहते हैं। देर से मिला न्याय न्याय का इंकार है। जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड। लोग अब अदालतों पर से भरोसा खोने लगे हैं। वह तुरंत कार्रवाई मांगते हैं। जब लोग अदालत के फैसले का इंतजार नहीं करते तो वह गोली की मांग करते हैं। जहां अदालत से ज्यादा भरोसा बंदूक पर है वहां कानून का राज कमजोर होने लगता है।
न्याय व्यवस्था तब फेल होती है जब करोड़ों नागरिक मान लेते हैं कि उन्हें न्याय नहीं मिलेगा। भारत में हर 10 लाख लोगों पर सिर्फ 22 जज है। हमें इस सिस्टम को बदलना होगा। हमें आधुनिक अदालतें चाहिए और न्यायिक सुधार को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनानी होगी। भारत को भीड़ का न्याय नहीं चाहिए। भारत को काम करने वाली अदालतें चाहिए। अगर आप मानते हैं कि न्यायिक सुधार जरूरी है तो इस वीडियो को शेयर कीजिए।
जय हिंद।
Transcribed from the video's YouTube auto-generated captions, lightly cleaned for reading. Wording may differ slightly from the audio.