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The System Failure: Beyond Politics / सिस्टम की विफलता: राजनीति से परे

4:36 · Video

Indian system failure beyond politics: exams, police and courts

Speaking in Hindi, Vinay Pasricha says up front that this video is not about the BJP, the Congress or any party. Parties, governments and prime ministers change, but the Indian state stays largely the same, and that is the real problem. He cites a recent report that some teenagers, one only 16, found flaws in India's examination systems from their bedrooms. Officers, contractors, consultants and auditors had either missed those flaws or failed to fix them. Running fair, reliable exams is among the most basic duties of a modern state, yet every year brings NEET controversies, paper leaks, technical failures and administrative confusion. Exams, he says, are only the start: citizens wait years for approvals, court cases run for decades and police reform has been discussed for generations. He then asks how citizens can trust the same state on national security, borders, intelligence, the power grid and cyber systems when its visible systems leak and the official response is to hide the problems, relying on what one student called "security through obscurity". A state earns trust on what we cannot see by being competent at what we can. He argues that India lacks neither talent nor resources. The problem is a system that rewards compliance over competence, procedure over outcomes, hierarchy over accountability and power over service. The real tragedy is that people have got used to it. He asks whether anyone has the courage to change the system itself, and urges viewers to share the video.

Key points

  • The problem isn't any one party: governments change, but the Indian state and its institutions stay the same.
  • Teenagers reportedly found exam-system flaws that officials, contractors and auditors missed. NEET controversies and paper leaks recur every year.
  • If visible systems leak and the response is "security through obscurity", citizens have little basis to trust the state on hidden systems like national security.
  • India lacks neither talent nor resources. The system rewards compliance over competence, procedure over outcomes and hierarchy over accountability.
  • The real tragedy is that citizens have got used to failure. The question is who will change the system itself.

एक स्टेट अपने सिटीजंस की सेवा के लिए होता है। सिटीजंस स्टेट की सेवा के लिए नहीं होते।

Hindi summary

इस हिंदी वीडियो में विनय पसरीचा साफ़ करते हैं कि बात किसी पार्टी की नहीं है। पार्टियाँ और सरकारें बदलती हैं, पर भारतीय स्टेट लगभग वैसा ही रहता है, और असली समस्या यही है। वे एक रिपोर्ट का ज़िक्र करते हैं जिसमें कुछ टीनएजर्स ने, जिनमें एक सिर्फ़ 16 साल का था, परीक्षा प्रणालियों की ऐसी खामियाँ ढूंढ निकालीं जो अफ़सर, कॉन्ट्रैक्टर और ऑडिटर नहीं पकड़ पाए। हर साल नीट विवाद, पेपर लीक और तकनीकी गड़बड़ियाँ होती हैं। अगर स्टेट एक परीक्षा तक ठीक से नहीं करवा सकता, तो सुरक्षा, बॉर्डर, पावर ग्रिड और साइबर सिस्टम पर भरोसा किस आधार पर करें, जब जवाब खामियाँ ठीक करने के बजाय "सिक्योरिटी थ्रू ऑब्सक्योरिटी" हो? उनके अनुसार कमी टैलेंट या संसाधनों की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की है जो काबिलियत से ज़्यादा कंप्लायंस, नतीजों से ज़्यादा प्रक्रिया और जवाबदेही से ज़्यादा पदानुक्रम को इनाम देता है। सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हमें इसकी आदत पड़ गई है। सवाल यह है कि क्या किसी में सिस्टम बदलने की हिम्मत है।

Topics

Transcript

Full transcript in Hindi · 823 words

अगर यह लोग एक एग्जाम तक ठीक से नहीं करवा सकते तो इन्हें पूरा देश चलाने के लिए कैसे ट्रस्ट करें? यह वीडियो बीजेपी के बारे में नहीं है। यह वीडियो कांग्रेस के बारे में नहीं है। यह वीडियो किसी भी पॉलिटिकल पार्टी के बारे में नहीं है। पार्टीज बदलती हैं, गवर्नमेंट्स बदलती हैं, प्राइम मिनिस्टर बदलते हैं, चीफ मिनिस्टर बदलते हैं। लेकिन इंडियन स्टेट वो लगभग वैसा ही रहता है।

और असली प्रॉब्लम यही है। एक रिसेंट रिपोर्ट में बताया गया कि कुछ टीनएजर्स ने एक तो सिर्फ 16 साल का अपने बेडरूम में बैठकर इंडिया के एग्जामिनेशन सिस्टम्स की खामियां ढूंढ निकाली। ऐसी खामियां जो ऑफिसर्स, कॉन्ट्रैक्टर्स, कंसलटेंट्स और ऑडिटर्स या तो पकड़ ही नहीं पाए या पकड़ कर भी ठीक नहीं कर पाए। जरा सोचो। एक मॉडर्न स्टेट की सबसे बेसिक जिम्मेदारी होती है फेयर और रिलायबल एग्जामिनेशंस करवाना।

करोड़ स्टूडेंट्स इन पर डिपेंड करते हैं। पेरेंट्स इनके लिए सैक्रिफाइस करते हैं। पूरे-पूरे करियर्स इन पर टिक्के होते हैं। और फिर भी हर साल नीट के कंट्रोवर्सीज, पेपर लीक्स, टेक्निकल फेलियर्स, सिक्योरिटी होल्स, एडमिनिस्ट्रेटिव कन्फ्यूजनंस। अगर स्टेट एक एग्जाम तक रिलायबली नहीं करवा सकता तो इसका क्या मतलब है? उसकी उस काबिलियत के बारे में जहां काम इससे कहीं ज्यादा कॉम्प्लेक्स है और एग्जामिनेशंस तो सिर्फ शुरुआत है। सिटीजंस सालों तक एक सिंपल अप्रूवल का इंतजार करते हैं।

कोर्ट केसेस डेकेड्स तक चलते रहते हैं। पुलिस रिफॉर्म पर जनरेशन से बात हो रही है। गवर्नमेंट प्रोजेक्ट्स रूटीनली अपने टाइमलाइंस और बजट से कहीं आगे निकल जाते हैं। आम आदमी घंटों बर्बाद करता है उस ब्यूरोक्रेसी में जहां काम सिंपल होना चाहिए था। पर अब वो सवाल जो हमें रात को सोने नहीं देना चाहिए। अगर एक स्टेट अपनी पुलिस फोर्स तक ठीक से नहीं चला सकता जो एक आम सिटीजन को एक आम सड़क पर सेफ रख सके।

अगर एक औरत यह भरोसा नहीं कर सकती कि उसकी एफआईआर लिखी जाएगी। अगर एक फैमिली यह भरोसा नहीं कर सकती कि उसके केस की इन्वेस्टिगेशन होगी तो हम उसी स्टेट पर पूरे देश की सिक्योरिटी के लिए भरोसा किस बेसिस पर करें। हमें बताया जाता है हमारे बॉर्डर सिक्योर है। हमें बताया जाता है हमारी इंटेलिजेंस शार्प है। हमें बताया जाता है हमारा पावर ग्रिड, हमारे साइबर सिस्टम्स सब सेफ हाथों में है।

लेकिन हमें कैसे पता जो सिस्टम्स हम देख सकते हैं एग्जाम पोर्टल्स, पब्लिक वेबसाइट्स, गवर्नमेंट डैशबोर्ड्स वो लीक हो रहे हैं। टीनएजर्स सीधे उनके अंदर घुस जाते हैं। और ऑफिशियल रिस्पांस क्या है? उन्हें ठीक करना नहीं उन्हें छुपाना। उस चीज का सहारा लेना जिसे उन स्टूडेंट्स में से एक ने नाम दिया था सिक्योरिटी थ्रू ऑब्सिक्योरिटी। यानी यह उम्मीद करना कि कोई देखेगा ही नहीं। बजाय इसके कि जब कोई देखे तो वहां कुछ मिलने को हो ही ना।

अगर यह सोच है उन सिस्टम्स के लिए जो हम देख सकते हैं। तो सोच क्या होगी उन सिस्टम्स के लिए जो हम ही नहीं सकते। हो सकता है जो कुछ हमें हमारी नेशनल सिक्योरिटी के बारे में बताया जाता है सब सच हो। हो सकता है सब कुछ सही हाथों में हो। लेकिन गौर करो हमसे मांगा क्या जा रहा है? हमसे कहा जा रहा है बस भरोसा कर लो।

कोई ऑडिट नहीं है जो हम पढ़ सकें। कोई टीनएजर कभी ग्रिड की खामियां या बॉर्डर्स के गैप्स ऑनलाइन पोस्ट नहीं कर पाएगा। उन्हें बस यकीन दिला दिया जाएगा कि सब ठीक है उन्हीं इंस्टिटशंस के द्वारा जो एक बच्चे की मार्कशीट तक सेफ नहीं रख पाए। एक स्टेट उन चीजों के लिए भरोसे का हकदार तब बनता है जब वो उन चीजों में कॉम्पिटेंट हो जो हम देख सकते हैं।

यह स्टेट वो हक नहीं कमा पाया। तो फिर इतना काबिल देश बार-बार इन बेसिक चीजों में फेल कैसे हो जाता है? टैलेंट की कमी नहीं है। इंडिया के पास दुनिया के कुछ सबसे ब्रिलियंट माइंड्स हैं। रिसोर्सेज की कमी नहीं है। प्रॉब्लम खुद सिस्टम में है। एक ऐसा सिस्टम जो कॉम्पिटेंस से ज्यादा कंप्लायंस को रिवॉर्ड करता है। आउटकम से ज्यादा प्रोसीजर को, अकाउंटेबिलिटी से ज्यादा हायरार्की को, सर्विस से ज्यादा पावर को।

ट्रेजडी यह नहीं है कि यह फेलियर्स होते हैं। ट्रेजडी यह है कि हमें इनकी आदत पड़ गई है। हम अब यह पूछते ही नहीं कि चीजें काम क्यों नहीं करती। हम बस मान लेते हैं कि मैं ही करेंगी। लेकिन एक स्टेट अपने सिटीजंस की सेवा के लिए होता है। सिटीजंस स्टेट की सेवा के लिए नहीं होते। सवाल यह नहीं है कि अगला इलेक्शन कौन जीतेगा? सवाल यह नहीं है कि अगला इलेक्शन कौन जीतेगा?

सवाल यह है कि क्या किसी में इतनी हिम्मत है कि वो सिस्टम को ही बदल दे। क्योंकि जब तक यह नहीं होता अलग-अलग पार्टीज वहीं ऑफिसेस संभालती रहेंगी। वहीं इंस्टीटशंस चलाती रहेंगी और वहीं आउटकम्स देती रहेंगी। चेहरे बदलेंगे, नारे बदलेंगे, सिस्टम वहीं रहेगा और फेलियर्स भी वही रहेंगे। अगर आपको लगता है कि यह सिस्टम बदलना चाहिए तो इस वीडियो को शेयर करें और देश में अवेयरनेस बढ़ाएं।

बदलाव की शुरुआत आपसे होती

Transcribed from the video's YouTube auto-generated captions, lightly cleaned for reading. Wording may differ slightly from the audio.

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